CA-20260927-8209High Exam Priority
सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल एसआईआर में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया
27 September 2026
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West Bengal Chief Minister Suvendu Adhikari blamed former CM Mamata Banerjee for the deletion of 27 lakh names from the State's electoral rolls during the Special Intensive Revision. The political controversy has intensified as opposition parties demand the restoration of removed voters ahead of municipal polls.
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए।
- मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक रूप से ये विलोपन न्यायिक अधिकारियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के सीधे आदेशों के अनुपालन में किए गए थे।
- मतदाता सूचियों की यह कानूनी कार्यवाही और सुदृढ़ीकरण मूल रूप से टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी द्वारा दायर एक याचिका से उपजा था।
- शहरी निकाय चुनावों के करीब आने के साथ ही मतदाता सूची की विसंगतियों से संबंधित 37 लाख से अधिक अपीलें विभिन्न न्यायाधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में लंबित हैं।
- वर्तमान प्रशासन ने विपक्ष के दोहरे मानदंडों पर सवाल उठाते हुए कहा कि केरल जैसे राज्यों में लागू किए गए ऐसे ही चुनावी संशोधनों का कोई राजनीतिक विरोध नहीं हुआ।
परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Facts)
मंत्रालय / विभाग
Ministry of Law and Justice / Election Commission of India
संबंधित संस्थाएं
Election Commission of India (ECI), Supreme Court of India, State Election Tribunals
संवैधानिक / कानूनी संदर्भ
Article 324 of the Constitution of India; Representation of the People Act, 1950; Registration of Electors Rules, 1960
स्टैटिक जीके संदर्भ
The Election Commission of India is a permanent constitutional body established on January 25, 1950, under Article 324. Voter registration and preparation of electoral rolls are handled in accordance with statutory provisions enacted by Parliament.
विस्तृत संपादकीय एवं मुख्य परीक्षा विश्लेषण
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर हालिया राजनीतिक तनाव न्यायिक निगरानी, प्रशासनिक जवाबदेही और चुनावी राजनीति के बीच जटिल तालमेल को उजागर करता है। मतदाता सूची से 27 लाख नाम हटाए जाने से तीव्र बहस छिड़ गई है, जहाँ विपक्षी दल वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का दावा कर रहे हैं, वहीं शासक दल का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से न्यायिक आदेशों के अनुरूप थी। यह प्रशासनिक अभ्यास भारत के चुनाव आयोग (ECI) या राजनीतिक विरोधियों द्वारा मनमाने ढंग से शुरू नहीं किया गया था, बल्कि इसे राज्य के प्रमुख विपक्षी दल के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा दायर याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत स्वतंत्र न्यायिक अधिकारियों द्वारा कार्यान्वित किया गया था।
संस्थागत दृष्टिकोण से, मतदाता सूचियों का प्रबंधन और अद्यतन करना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत सख्ती से विनियमित सांविधिक कार्य हैं। चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है, जिसका उत्तरदायित्व स्वतंत्र, निष्पक्ष और नियमित चुनाव सुनिश्चित करना है। हालाँकि, दोहरे, मृत या अपात्र प्रविष्टियों को हटाने और लोकतांत्रिक अखंडता सुनिश्चित करने के लिए अक्सर अदालतों द्वारा गहन संशोधनों का आदेश दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में, महत्वपूर्ण नगरपालिका चुनावों से पहले विशेष न्यायाधिकरणों में 37 लाख से अधिक अपीलों के लंबित होने से प्रशासनिक बाधाएँ और गंभीर हो गई हैं।
यह विवाद मतदाता सूची प्रबंधन में पारदर्शिता और सांविधिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं के राजनीतिकरण से जुड़ी एक व्यापक लोकतांत्रिक चुनौती को रेखांकित करता है। जबकि राजनीतिक दल अक्सर नैरेटिव गढ़ने के लिए चुनावी संशोधन प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, न्यायाधिकरणों में लाखों अपीलों का लंबित रहना निवारण तंत्र में एक गंभीर प्रणालीगत कमी को उजागर करता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि मताधिकार से वंचित होने की स्थिति न्यूनतम हो और सूची की शुद्धता बनी रहे, एक सुव्यवस्थित अर्ध-न्यायिक अपीलीय प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक क्षरण को रोकने के लिए चुनाव अधिकारियों द्वारा अधिक डिजिटल पारदर्शिता की आवश्यकता है।