CA-20260928-4710High Exam Priority
आयुष मंत्रालय ने अश्वगंधा की सुरक्षा साबित करने वाला клиниकल अध्ययन प्रकाशित किया
28 September 2026
4 min read
Source:PIB India (Press Information Bureau)
A multi-centre clinical trial published in Frontiers in Medicine confirms that daily consumption of standardized Ashwagandha root extract over 24 weeks causes no adverse effects on liver or kidney functions. The research underscores the growing scientific validation of traditional Ayurvedic interventions.
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- भारत के सात विशिष्ट केंद्रों पर 18 से 70 वर्ष की आयु के 1,200 स्वस्थ वयस्क प्रतिभागियों पर 24 सप्ताह के रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड, प्लेसीबो-नियंत्रित परीक्षण का मूल्यांकन किया गया।
- प्रतिभागियों को कोविडशील्ड टीकाकरण के बाद प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क (4 ग्राम कच्ची जड़ के चूर्ण के बराबर) की खुराक दी गई।
- बहुविषयक अनुसंधान दल में CCRAS, AIIA और ट्रांसलेशनल हेल्थ रिसर्च निकायों सहित 9 प्रमुख संस्थानों के 45 शोधकर्ता शामिल थे।
- मानक क्लिनिकल आकलनों से पुष्टि हुई कि संपूर्ण परीक्षण अवधि के दौरान लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया का स्तर सामान्य संदर्भ सीमाओं के भीतर रहा।
- पारदर्शी अनुसंधान प्रोटोकॉल बनाए रखने के लिए इस क्लिनिकल ट्रायल को आधिकारिक रूप से 'क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री-इंडिया' (CTRI/2021/06/034496) के तहत पंजीकृत किया गया था।
परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Facts)
मंत्रालय / विभाग
Ministry of Ayush
संबंधित संस्थाएं
Central Council for Research in Ayurvedic Sciences (CCRAS), All India Institute of Ayurveda (AIIA), Translational Health Science and Technology Institute (THSTI)
संवैधानिक / कानूनी संदर्भ
Drugs and Cosmetics Act, 1940 and Rules thereunder regulating Ayurvedic, Siddha, and Unani drugs in India.
स्टैटिक जीके संदर्भ
Ashwagandha (Withania somnifera) is a vital medicinal herb in Ayurveda, traditionally classified as a 'Rasayana' (rejuvenator) known for its adaptogenic properties.
विस्तृत संपादकीय एवं मुख्य परीक्षा विश्लेषण
समीक्षित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में इस व्यापक क्लिनिकल ट्रायल का प्रकाशन साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। ऐतिहासिक रूप से, कठोर और बड़े पैमाने पर क्लिनिकल सुरक्षा डेटा की कमी के कारण पारंपरिक हर्बल दवाओं को वैश्विक स्तर पर संदेह का सामना करना पड़ता है। आधुनिक क्लिनिकल अनुसंधान में स्वर्ण मानक मानी जाने वाली रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड, प्लेसीबो-नियंत्रित पद्धति को अपनाकर, आयुष मंत्रालय व्यवस्थित रूप से प्राचीन वनस्पति ज्ञान को समकालीन वैज्ञानिक जांच के साथ जोड़ रहा है। यह सक्रिय दृष्टिकोण न केवल वैश्विक उपभोक्ता विश्वास का निर्माण करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन की विनियामक स्वीकृति को भी सुगम बनाता है।
Official Reference:PIB India (Press Information Bureau)